https://www.youtube.com/watch?v=GZFkhdm2NcA
माटी के लाल की अंतिम विदाई में शिरकत करने की कुछ बातें:
----------------
प्रात:काल भोपाल आकर,मा.शरद यादव जी के गांव आखरमऊं में अन्त्येष्टी के कार्यक्रम जाने हेतु सुनील सरदार जी के साथ जब हम दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे थे तब उनके कुछ संबंधी भी उसी जहाज से भोपाल जा रहे थे, स्वाभाविक था उन लोगों से यह समझना कि किस तरह का कार्यक्रम है। राजकमल राव जो उनके सन इन लॉ है से यह तय हो गया था कि बाहर मिलते हैं, इसी समय बातचीत में पता चला प्रोफ़ेसर सुशीला मोराले भी दूसरी फ्लाइट से भोपाल आ रही है हमारे उनके पहुंचने का अंतर बहुत कम था।
सुनील सरदार जी के और हमारे कई मित्र राष्ट्रीय पिछड़ा संगठन चलाते हैं जो कुशवाहा समाज से आते हैं जिनमें एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाहा, यशवीर कुशवाहा अपने खैरी साथी हो के साथ भी एयरपोर्ट पर उपस्थित हो गए थे।
राजकमल राव से मुलाकात हुई और उन्होंने जो कार्यक्रम बताया उसके अनुसार लगभग 12:00 बजे माननीय का पार्थिव शरीर बाई एयर भोपाल आना था स्वाभाविक है कि अब उसी कार्यक्रम से जुड़े स्टेट लॉउन्ज की तरफ हमे ले जाया गया।
मेरी फ्लाइट लगभग 7:30 बजे प्रातः काल भोपाल पहुंच गई थी और हम सब लोग 8:00 बजे तक इकट्ठे हो गए थे अब थोड़े बहुत विलंब से हम लोग उससे कह पहुंचे थे जहां पर प्रशासन तैयारी किए हुए थे माननीय के पार्थिव शरीर को ले आने के लिए
अब धीरे-धीरे बात लोगों तक पहुंच गई थी और भोपाल की जो भी उनके जमाने के नेता थे या उनके चाहने वाले थे इकट्ठे होने शुरू हो गए थे।
11:00 बजे के आसपास कांग्रेस के बड़े नेता और मध्य प्रदेश के अनेक बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह जी भी आ गए और जैसे ही 12:00 बजने को हुआ उससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वहां उपस्थित हो गए।
सभी के चेहरे नाम थे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे इतनी शांति पसरी हुई है और मीडिया के लोग उसी में अपने-अपने चैनल के लिए पल-पल की खबर दे रहे थे। कि फला फला आ गए हैं और पता चला है कि पार्थिव शरीर लगभग 12:00 बजे आने वाला है, यही हुआ उस स्टेट लाउंज में दरवाजे खुले और कंधे पर उनके पार्थिव शरीर को उठाए हुए शांतनु एवं परिवार के अन्य सदस्य दिखाई दिए साथ में सुभाषिनी उनकी मां के साथ जो महिलाएं इस अवसर पर रिसीव करने गई थी सब लोग आती हुई नजर आई।
मा. शरद जी के जिस पार्थिव शरीर को छतरपुर स्थित उनके आवास पर देखा था, जहां देश के राजनीतिक बहुत ही विनम्रता से उन्हें विदाई दे रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे वह विश्राम कर रहे हैं और अभी थोड़ी देर में उठ खड़े होंगे, यह उनके साहस के प्रति कम से कम मेरे मन में हमेशा विश्वास था, जितनी शालीनता से देश के बहुजन मानस की सेवा के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी लगा दी। आज सुबह कल की सुबह से अलग थी क्योंकि जैसे ही उनके ना रहने की खबर मुझे फोन द्वारा संजय भाई ने दी थी उसी समय प्रातः काल दिल्ली के लिए निकलने की फ्लाइट मुंबई से तय हो गई थी अजय भाई और उनके परिवार को जब हमने यह खबर बताएं तो सभी लोग आहत थे और मेरा तत्काल दिल्ली पहुंचना मेरे कर्तव्य साथ जुड़ा हुआ था।
लेकिन आज भोपाल के हवाई अड्डे पर लगने लगा था कि अब वह हमारे बीच से चले गए हैं।उन्हें एक सफेद बक्शे में पार्थिव शरीर के रूप में चार्टर्ड के द्वारा भोपाल लाया गया था और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी यह यात्रा मुझे पैतृक गांव के लिए एक काफिले की निकल ली थी प्रदेश के मुख्यमंत्री इस यात्रा की अगवानी किए थे और निवर्तमान मुख्यमंत्री इस यात्रा में उनके पैतृक गांव तक बिल्कुल सामान्य व्यक्ति की तरह मौजूद रहे।
जगह-जगह लोगों ने उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए इस पार्थिव शरीर के वाहन में चालक के बगल में बैठे उनके पुत्र शांतनु सबके अभिवादन स्वीकार करते हुए बढ़ रहे थे, सामाजिक न्याय के अग्रदूत मंडल मसीहा आज अपनी उसी मातृभूमि को लौट रहे थे जहां से वह निकल कर जबलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा लेने के लिए एक युवा के रूप में आए थे।
तब से लेकर अब तक उस गांव जाने के रास्ते हाईवे से जुड़े हैं के आसपास उद्योग धंधे बड़े हैं बड़े हिस्से में पर्वतीय श्रृंखलाएं दिखाई देती है लेकिन उनके घर पहुंचने से पहले जो हरे भरे खेतों का बहुत बड़ा विस्तार दिखाई दिया वह बता रहा था जी यह कृषि योग्य उपजाऊ भूमि है।
गांव के रास्ते पर मुडने से पहले के एक पेट्रोल पंप पर स्थानीय प्रशासन के लोग पुलिस की खुली गाड़ी को बहुत सादगी से तैयार करके रखे थे और अब भोपाल से लाए वाहन से पार्थिव शरीर को निकालकर उस पुलिस की गाड़ी पर रखा गया जिस पर चढ़ने की मेरी हिम्मत नहीं हुई हालांकि इस गाड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी के साथ परिवार के लगभग सभी सदस्य उपस्थित थे मैं चाह कर भी नहीं जा सकता था मैं अक्सर उनके पास रहकर खड़ा ही रहता था, और जब से मै उनके साथ राजनीति में आया था मर्यादाओं का बहुत ध्यान रखता था।
मुझे लग रहा था जैसे वह कह रहे हैं तुम करीब क्यों नहीं आ रहे हो। मैं दूसरी तरफ चला जाता था की जिससे उन्हें यह ना दिखाई दे। लेकिन हमेशा उनके विचारों के साथ होता था, जब लोग के साथ अकेले होता था क्या क्या सिखाते थे कितनी पुरानी पुरानी बातें बताते थे मैंने देखा था कि राजनीति में जो इतने करीब दिखाने की कोशिश करता है उसका भाव क्या है वह बहुत अच्छी तरह समझते थे।
आज यह अवसर ऊन बातों को कहने का नहीं है आंख बार-बार भर आ रही थी, क्योंकि पिछले दिनों से सरकार की निरंकुशता जब उसने सात तुगलक रोड के आवास को एक ऐसे व्यक्ति से खाली करा लिया था जिस व्यक्ति का योगदान देश के संविधान को गौरवान्वित करने का रहा हो, उनका अपना कोई निजी आवास ना होने की वजह से उन्हें सुदूर छतरपुर के फार्म हाउस में किराए के घर में रहना पड़ा था।
यह बात अब समझ में आई कि अपने परिजनों से उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के लिए अपने गांव को क्यों चुनने को कहा था.......?
अब जैसे ही सड़क से पार्थिव शरीर का वाहन गांव में मुड़ा था अगल बगल मेला लगा था, बड़े बुजुर्ग सभी दुखी थे, हालांकि रास्ते में जितनी बाजारें पड़ी थी उनमें ऐसा लग रहा था जैसे सब लोग सड़क पर आ गए हैं, जो सड़क पर नहीं आए हैं वह अपने छतों की मुरेडों से ऐसे नायक को देख रहे हो जो सत्य के मार्ग पर चलते हुए वहां वापस आ रहा हो जहां से वह देश की सेवा के लिए निकला था, अपने उसी भारत के गांव में जो आज के गांव जैसा और आज के नेताओं जैसा नहीं है जहां पर केवल अपनी सुविधाओं का अंबार लगा दिया जाता है।
एक और बात बताता चलूं कि उनके इंजीनियरिंग के साथी जैन साहब उनके गांव में पैदल चल रहे थे जो पूरे जैसे शहर में अपना उद्योग चलाते हैं एयरपोर्ट से ही मैं उनको देख रहा था उनकी सादगी उनका समर्पण और एक मित्र के प्रति समर्पित सम्मान।
और वहां के लोगों की छवि।
मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी तक अपनी उपस्थिति से कितने शांतप्रिय तरीके से माननीय शरद यादव जी के प्रति आदर और सम्मान दिया है, यह उनके महान व्यक्तित्व कसौटी रही है क्योंकि वह हमेशा बाबा साहब अंबेडकर पेरियार राम मनोहर लोहिया जगदेव प्रसाद कुशवाहा ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले बिरसा मुंडा और न जाने कितने ऐसे नायक जिन पर हमेशा पर चर्चा करनी थी उन्होंने अपने कर्तव्य के साथ उन्हीं लोगों के त्याग और जनकल्याण की विचारधारा को जीवन भर धारण करके रखा आज वही जनता विस्मयकारी दृष्टि से उस पूरे सफर को देख रही थी।
मैंने देखा कि वहां के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बैठ कर के सारी व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे और जो भी पुलिस व्यवस्था के लिए लगाई गई थी जैसे उसको पता हो कि वह क्या चाहते थे।
मैं जब गांव में पारंपरिक क्रियाकलाप चल रहे थे तो अड़ोस पड़ोस की उन घरों पर गया जो महिलाएं लगभग बुजुर्ग हो गई थी उनसे पूछा कि आप कुछ कहेंगी उनके बारे में। सुदूर जमीन पर बैठा एक व्यक्ति कह रहा था जब वह आते थे तो सबको पैसा मांगे थे किसी को नहीं छोड़ देते जो भी उनसे मिलता था।
अपने वैभवशाली केंद्र और प्रदेशों की सत्ता जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय था सुचिता थी जिसकी आवाज से भारत की संसद और संसदीय गरिमा में उनकी संवैधानिक ढांचे को ठीक करने के लिए दहाड़ को पूरा देश देखता और सुनता था,
मंडल कमीशन का मामला हो सामाजिक न्याय का मामला इसके अलावा उनके अनेक क्षेत्रों में किए गए सुधारवादी कार्यक्रमों का सवाल हो। श्रोता यह महसूस करता था कि जैसे उसका अपना कोई प्रतिनिधि भारत के इस बड़े पंचायत घर में बहुत जोरदार तरीके से उसकी आवाज को बुलंद कर रहा है।
आज गांव पहुंचकर यह लगा कि वह किसके लिए बोलते थे उन बेईमानों के लिए जो उनके साथ लगे रहे और उनके विचारों से बहुत दूर रहें, कितने लोगों को जानता हूं मैं लेकिन वह गांव उनकी सच्चाई कर रहा था नॉर्मल है नमन कर रहा था वहां के पेड़ पौधे पशु पक्षी उस मिट्टी से निकले हुए व्यक्ति के अपने साथ समाहित होने के उत्सव में शरीक थे।
एक बात विचलित कर रही थी पूरे जीवन उन्होंने जिस पाखंड के खिलाफ खुल करके बोला, उन्हीं पाखंडीयों की परंपरा के नाम पर मैं भीतर से बहुत कमजोर महसूस कर रहा था एक ऐसे महापुरुष को उनके आसपास के लोग नहीं समझ पाए। हो ना हो कल वह जरूर समझें जो व्यक्ति अपनी इस मिट्टी से जुड़ा रहना चाहता था, उसके लोग उनसे क्यों नहीं जुड़ पाए।
सादर नमन।
अलविदा।
