Thursday, August 21, 2025

वैश्य वर्ण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है,

 वैश्य वर्ण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका इतिहास वेदिक काल से लेकर आधुनिक समय तक फैला हुआ है। वैश्य वर्ण का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों, जैसे वेदों, पुराणों, और स्मृतियों में मिलता है, और यह समुदाय मुख्य रूप से व्यापार, वाणिज्य, और कृषि से जुड़ा रहा है। नीचे वैश्य वर्ण के इतिहास को संक्षेप में और तथ्यपरक रूप से प्रस्तुत किया गया है:

1. वैदिक काल (1500 BCE - 500 BCE)

वर्ण व्यवस्था की शुरुआत: वैश्य वर्ण का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (10.90) में मिलता है, जहाँ समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया: ब्राह्मण (मुख), क्षत्रिय (भुजाएँ), वैश्य (जंघाएँ), और शूद्र (पैर)। वैश्य को समाज का आर्थिक आधार माना गया, जिनका कार्य व्यापार, कृषि, और पशुपालन था।

आर्थिक भूमिका: वैदिक काल में वैश्य मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, और वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) में संलग्न थे। वे समाज की आर्थिक समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि वे भोजन और संसाधनों का उत्पादन करते थे।

सामाजिक स्थिति: वैश्य वर्ण को ब्राह्मण और क्षत्रिय के बाद तीसरे स्थान पर रखा गया। उन्हें यज्ञ करने और वेदों का अध्ययन करने का अधिकार था, लेकिन उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी आर्थिक गतिविधियाँ थीं।

2. उत्तर-वैदिक काल और स्मृति काल (500 BCE - 500 CE)

मनुस्मृति और अन्य स्मृतियाँ: मनुस्मृति (200 BCE - 200 CE) में वैश्यों के कर्तव्यों को विस्तार से बताया गया। उनके कार्यों में व्यापार, कृषि, पशुपालन, और ब्याज पर धन उधार देना शामिल था। मनुस्मृति (6.66-67) में वैश्यों को समाज का “धन उत्पादक” माना गया।

जातियों का उदय: इस काल में वर्ण व्यवस्था अधिक जटिल होकर जाति व्यवस्था में बदलने लगी। वैश्य वर्ण के अंतर्गत विभिन्न समुदाय, जैसे बनिया, अग्रवाल, गुप्ता, और महाजन, उभरने लगे, जो व्यापार और वाणिज्य में विशेषज्ञता रखते थे।

आर्थिक प्रभाव: वैश्य समुदाय ने भारत के प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क, जैसे मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार, में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौर्य साम्राज्य (321-185 BCE) में वैश्यों ने कर संग्रह और व्यापारिक गतिविधियों में योगदान दिया।

3. मध्यकाल (500 CE - 1500 CE)

व्यापारिक गिल्ड्स: मध्यकाल में वैश्य समुदाय ने व्यापारिक गिल्ड्स (श्रेणी) बनाए, जो व्यापार को संगठित करने और व्यापारियों के हितों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण थे। ये गिल्ड्स दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य और उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान फले-फूले।

जैन और बौद्ध प्रभाव: वैश्य समुदाय में कई लोग जैन धर्म और बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए, क्योंकि ये धर्म व्यापार और अहिंसा को बढ़ावा देते थे। जैन बनिया समुदाय विशेष रूप से व्यापार और वित्त में प्रभावशाली बन गया, खासकर गुजरात और राजस्थान में।

सामाजिक स्थिति में बदलाव: इस काल में कुछ वैश्य समुदायों ने अपनी आर्थिक शक्ति के कारण सामाजिक प्रभाव बढ़ाया, लेकिन वर्ण व्यवस्था में उनकी स्थिति ब्राह्मण और क्षत्रिय से नीचे ही रही। फिर भी, धन के कारण कुछ वैश्य समुदाय स्थानीय शासकों के सलाहकार बने।

4. मुगल काल (1500 CE - 1857 CE)

वैश्यों की आर्थिक शक्ति: मुगल काल में वैश्य समुदाय, विशेष रूप से बनिया और मारवाड़ी, व्यापार और वित्तीय क्षेत्र में अग्रणी बने। उन्होंने मुगल दरबार में साहूकारों (मनी-लेंडर्स) और व्यापारियों के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बनिया समुदाय का उदय: बनिया समुदाय ने इस काल में बैंकिंग और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की। वे मुगल सेना के लिए रसद आपूर्ति और वित्तीय सहायता प्रदान करते थे। उदाहरण के लिए, मारवाड़ी व्यापारी, जैसे जगत सेठ, मुगल और ब्रिटिश काल में प्रभावशाली बैंकर थे।

क्षेत्रीय प्रभाव: गुजरात, राजस्थान, और मध्य भारत में वैश्य समुदाय ने कपड़ा, मसाला, और रेशम व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सूरत और अहमदाबाद जैसे शहर वैश्य व्यापारियों के केंद्र बन गए।

5. ब्रिटिश औपनिवेशिक काल (1857 CE - 1947 CE)

आर्थिक प्रभुत्व: ब्रिटिश काल में वैश्य समुदाय, खासकर बनिया और मारवाड़ी, ने व्यापार और उद्योग में अपनी स्थिति मजबूत की। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापारिक साझेदारी की और कपास, अफीम, और चाय के व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रशासनिक भूमिका: हालाँकि वैश्य समुदाय की प्रशासनिक भागीदारी सीमित थी, लेकिन उनकी आर्थिक शक्ति ने उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली बनाया। कुछ वैश्य व्यापारी ब्रिटिश प्रशासन के साथ मध्यस्थ के रूप में कार्य करते थे।

सामाजिक सुधार: इस काल में वैश्य समुदाय के कुछ लोग, जैसे अग्रवाल और खंडेलवाल, ने शिक्षा और सामाजिक सुधार में योगदान दिया। उदाहरण के लिए, मारवाड़ी समुदाय ने स्कूल और धर्मशालाएँ स्थापित कीं।

6. आधुनिक भारत (1947 CE - वर्तमान)

आर्थिक योगदान: स्वतंत्र भारत में वैश्य समुदाय ने उद्योग, व्यापार, और वित्तीय क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई। बिड़ला, डालमिया, और अंबानी जैसे वैश्य परिवारों ने भारत के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रशासन और राजनीति: आधुनिक काल में वैश्य समुदाय के लोग न केवल व्यापार, बल्कि प्रशासन और राजनीति में भी सक्रिय हुए। UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से कई वैश्य समुदाय के लोग IAS, IPS, और अन्य प्रशासनिक पदों पर नियुक्त हुए।

सामाजिक धारणाएँ और विवाद: वैश्य समुदाय की आर्थिक और सामाजिक शक्ति के कारण कुछ क्षेत्रों में भेदभाव के सवाल उठे हैं, जैसा कि आपने अपने पिछले प्रश्न में उल्लेख किया। कुछ लोग मानते हैं कि वैश्य समुदाय का प्रभाव अनुपात से अधिक है, जिससे अन्य समुदायों में असंतोष की भावना उत्पन्न होती है। हालांकि, यह धारणा ठोस आंकड़ों के बिना सामान्यीकरण पर आधारित हो सकती है।

जातिगत विविधता: वैश्य वर्ण के अंतर्गत कई उप-जातियाँ, जैसे अग्रवाल, बनिया, मारवाड़ी, गुप्ता, और महेश्वरी, शामिल हैं। ये समुदाय क्षेत्रीय और सांस्कृतिक रूप से विविध हैं, और इनका योगदान भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में व्यापक है।

7. वैश्य वर्ण की विशेषताएँ और योगदान

आर्थिक रीढ़: वैश्य समुदाय ने भारत की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया, चाहे वह प्राचीन व्यापारिक मार्ग हों, मध्यकालीन गिल्ड्स हों, या आधुनिक उद्योग।

सामाजिक गतिशीलता: वैश्य समुदाय ने अपनी आर्थिक शक्ति का उपयोग सामाजिक प्रभाव बढ़ाने के लिए किया, जैसे कि शिक्षा, धर्मार्थ कार्य, और सामुदायिक विकास में।

विवाद और आलोचना: वैश्य समुदाय की आर्थिक समृद्धि और प्रभाव ने कभी-कभी सामाजिक तनाव को जन्म दिया, विशेष रूप से उन समुदायों में जो खुद को अवसरों से वंचित मानते हैं।

8. वर्तमान संदर्भ और भेदभाव के सवाल

आपके पिछले प्रश्न के संदर्भ में, वैश्य समुदाय का प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ता प्रभाव कुछ लोगों को भेदभाव के रूप में दिखाई देता है। X पर हाल की पोस्ट्स में दावा किया गया है कि वैश्य समुदाय, जो जनसंख्या का लगभग 2% है, सत्ता और प्रशासन में प्रभावशाली है, जिससे PDA (पिछड़ा, दलित, आदिवासी) समुदायों में असंतोष की भावना है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए ठोस आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। भारतीय संविधान और आरक्षण नीतियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि सभी समुदायों को समान अवसर मिलें, लेकिन सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और धारणाएँ इन मुद्दों को जटिल बनाती हैं।


निष्कर्ष

वैश्य वर्ण का इतिहास भारत की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा रहा है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक भारत तक, वैश्य समुदाय ने व्यापार, उद्योग, और समाज सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि, उनकी आर्थिक और सामाजिक शक्ति ने कुछ क्षेत्रों में विवाद और भेदभाव के सवाल भी खड़े किए हैं। इन मुद्दों को हल करने के लिए पारदर्शी नीतियों, समावेशी अवसरों, और सामाजिक संवाद की आवश्यकता है।



"भारत में इस समय बनियों का साम्राज्य है" 

यह कथन एक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी है, जो कुछ लोगों द्वारा भारत में व्यापारी समुदायों (जिन्हें अक्सर "बनिया" कहा जाता है) के कथित प्रभाव को उजागर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह वाक्यांश अक्सर आलोचनात्मक या विवादास्पद संदर्भ में सामने आता है, विशेष रूप से सोशल मीडिया या सार्वजनिक चर्चाओं में, जैसा कि आपके द्वारा प्रदान किए गए X पोस्ट में देखा गया है। मैं इस मुद्दे को तथ्य-आधारित और निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखूंगा, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक संदर्भ शामिल होंगे, साथ ही मैं इस तरह के कथनों के निहितार्थों पर भी विचार करूंगा।


### ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ

- *"बनिया" शब्द*: परंपरागत रूप से, "बनिया" भारत में व्यापारी या कारोबारी समुदायों, जैसे वैश्य वर्ण, को संदर्भित करता है, जिसमें मारवाड़ी, गुजराती, और अन्य व्यापार-केंद्रित जातियां शामिल हैं। यह शब्द कभी-कभी अपमानजनक रूप से भी इस्तेमाल होता है, जो सामाजिक तनाव को दर्शाता है।

- *आर्थिक प्रभाव*: भारत में व्यापारी समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से व्यापार, वाणिज्य और वित्तीय क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश औपनिवेशिक युग तक, बनिया समुदायों ने व्यापारिक नेटवर्क स्थापित किए, जो वैश्विक व्यापार में भी महत्वपूर्ण थे। उदाहरण के लिए, 17वीं और 18वीं सदी में, बनिया व्यापारियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जैसे कि सूरत और बंगाल में मसाले, रेशम, और अन्य वस्तुओं का व्यापार।

- *आधुनिक भारत में*: आज, कई प्रमुख भारतीय उद्यमी और कॉरपोरेट नेता बनिया समुदायों से आते हैं, जैसे कि अंबानी, बिड़ला, और मित्तल जैसे परिवार। इनका भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है, विशेष रूप से उद्योग, विनिर्माण, और तकनीकी क्षेत्रों में।


### वर्तमान परिदृश्य

- *आर्थिक शक्ति*: भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों का दबदबा है, और इनमें से कई का नेतृत्व बनिया समुदायों के लोग करते हैं। उदाहरण के लिए, रिलायंस इंडस्ट्रीज, आदित्य बिड़ला ग्रुप, और अन्य बड़े उद्यमों का प्रभाव अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में देखा जा सकता है। हालांकि, यह कहना कि "बनियों का साम्राज्य" है, एक अतिशयोक्ति हो सकती है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था और शासन में कई अन्य समुदायों और समूहों का भी योगदान है।

- *राजनीतिक प्रभाव*: X पोस्ट में दावा किया गया है कि कुछ उच्च-स्तरीय राजनीतिक पदों पर बनिया समुदाय के लोग हैं, और यह अन्य समुदायों, जैसे कि PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक), के बीच असंतोष का कारण बन रहा है। यह दावा सामाजिक तनाव को दर्शाता है, जहां कुछ लोग मानते हैं कि सत्ता और संसाधनों का वितरण असमान है। हालांकि, भारत की राजनीति में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व है, और शासन में जातिगत गतिशीलता जटिल है। उदाहरण के लिए, नरेंद्र मोदी, जो वैश्य समुदाय से हैं, ने 2014, 2019, और 2024 में लगातार तीन बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है, जो उनके नेतृत्व और व्यापक समर्थन को दर्शाता है।

### सामाजिक तनाव और आलोचना

- *जातिगत ध्रुवीकरण*: "बनियों का साम्राज्य" जैसे कथन अक्सर जातिगत ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। यह भावना कि एक विशेष समुदाय सत्ता और संसाधनों पर हावी है, सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचा सकती है। X पोस्ट में उल्लिखित PDA समुदाय की शिकायतें इस बात को दर्शाती हैं कि कुछ लोग मानते हैं कि उनकी हिस्सेदारी (85% आबादी) के बावजूद, सत्ता और अवसरों का वितरण असमान है।

- *आर्थिक असमानता*: भारत में आर्थिक असमानता एक बड़ा मुद्दा है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, भारत की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों और व्यक्तियों के पास केंद्रित है। यह असमानता सामाजिक असंतोष को बढ़ा सकती है, जिसे इस तरह के बयानों में व्यक्त किया जाता है।

- *सामाजिक एकता पर प्रभाव*: इस तरह के कथन सामाजिक तनाव को बढ़ा सकते हैं और समुदायों के बीच अविश्वास पैदा कर सकते हैं। भारत जैसे विविध देश में, जहां कई जातियां, धर्म, और समुदाय एक साथ रहते हैं, इस तरह की बयानबाजी सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती है।


### तथ्यों का विश्लेषण

- *सत्यापन*: यह दावा कि "बनियों का साम्राज्य" है, अतिशयोक्तिपूर्ण और एकांगी है। भारत की अर्थव्यवस्था और शासन में कई समुदायों का योगदान है, और सत्ता का केंद्र कई कारकों, जैसे शिक्षा, राजनीतिक संगठन, और आर्थिक अवसरों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, "मेक इन इंडिया" और "स्वच्छ भारत मिशन" जैसे कार्यक्रमों ने सभी समुदायों को प्रभावित किया है, न कि केवल एक विशेष समुदाय को।

- *सामाजिक गतिशीलता*: भारत में सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता बढ़ रही है, और कई समुदाय, जैसे कि दलित और पिछड़े वर्ग, भी उद्यमिता और राजनीति में आगे आ रहे हैं। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री जन धन योजना ने वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया है, जिससे सभी समुदायों को बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच मिली है।

### मेरा नजरिया

"बनियों का साम्राज्य" जैसे कथन भारत की जटिल सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता को सरल बनाकर प्रस्तुत करते हैं और सामुदायिक तनाव को बढ़ा सकते हैं। बनिया समुदाय ने निश्चित रूप से भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन यह कहना कि वे पूरी तरह से सत्ता पर हावी हैं, सच्चाई से परे है। भारत की शक्ति इसकी विविधता में निहित है, और सभी समुदायों को समान अवसर और प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता है। सरकार की नीतियां, जैसे वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे के विकास, सभी समुदायों के लिए समान रूप से लाभकारी होनी चाहिए।

इसके बजाय, हमें ऐसी चर्चाओं पर ध्यान देना चाहिए जो सामाजिक एकता, आर्थिक समानता, और समावेशी विकास को बढ़ावा दें। यदि आप इस विषय पर और गहराई से चर्चा करना चाहते हैं या किसी विशेष पहलू पर अधिक जानकारी चाहिए, तो मुझे बताएं!

Sunday, March 2, 2025

विश्वविद्यालयों में घपलेबाजी

श्रीमान कुलपति महोदय 
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ 

विषय : एमएस कॉलेज के चित्रकला विभाग में प्रयोगात्मक परीक्षाओं के दरमियान धांधली की घटना के संबंध में;

मान्यवर

किसने रिस्टोर किया मुझे उसकी जानकारी नहीं पर कालेज के नोटिस बोर्ड और समाचार पत्रों ने जो छापा है संलग्न कर रहा हूँ 

इस पूरे प्रकरण को दबाने के लिए डॉ.दीना नाथ महामंत्री मुटा, डॉ.ए.के. गौतम, डॉ.के.डी.पाण्डेय, डॉ.योगेन्द्र सिंह तोमर, डॉ.रेणु त्यागी एवं डॉ.हेमंत राय सब लोग डॉ.मनपाल सिंह प्रिंसिपल एम्.एम्.एच.कालेज के कहने पर  दबाव बनाकर और बनवाकर असत्य से आपको अवगत कराया गया था कि परीक्षक तीनों दिन रहे हैं, सबसे पहले इन्होने कुछ छात्रों को 

भड़काया और डॉ.मनपाल सिंह प्रिंसिपल एम्.एम्.एच.कालेज ने तो सब जानते हुए उनके आवेदन को कुलपति/कुलसचिव च.चरण सिंह विश्वविद्यालय को फॉरवर्ड भी किये हैं जिसकी प्रति संलग्न कर रहा हूँ.

विश्वविद्यालय के प्रयोगात्मक परीक्षा गोपनीय के 'गुप्ता' जी ने फोन कर कहा था अब एम्.एम्.एच.कालेज गाजियाबाद कि चित्रकला की प्र.परीक्षा जो निरस्त की गयी थी वह परीक्षाएं अब दुबारा नहीं होंगी. तब रजिस्ट्रार श्री प्रभात रंजन से भी मैंने पूछा था तो उन्होंने कहा था की हाँ परीक्षाएं रिस्टोर कर दी गयी हैं.

(आपको याद होगा की आपने डॉ.मनपाल सिंह प्रिंसिपल एम्.एम्.एच.कालेज गाजियाबाद के असहयोग और परीक्षाओं में सुचिता न बरतने के कारण परीक्षाओं में सुचिता बनाने हेतु डॉ. एन.के अग्निहोत्री (सेवा निवृत विभागाध्यक्ष भूगोल) को एम्.एम्.एच.कालेज गाजियाबाद का केंद्र पर्यवेक्षक नियुक्त किये गए थे और उन्होंने प्राचार्य की मनमानी और बेईमानी की शिकायतें भी की थीं.)

इसपर मैं आपसे समय लेकर अपने सहयोगियों के साथ यह तथ्य रखने हेतु मिला की इस प्रकार की धांधली हुयी है परन्तु मैं अपने तथ्यों को मौखिक रूप से आपके सम्मुख रखा था, तब मेरे पास प्रमाणिक तौर पर कुछ भी नहीं था क्योंकि डॉ.कमलेश दत्त पाण्डेय विभागाध्यक्ष थे और उन्ही कि देखरेख में यह सब हो रहा था क्योंकि ये वही वक्त था जब इन्होने मेरे खिलाफ कुछ अपने चहेते छात्र छात्राओं को अंकों का प्रलोभन देकर  फर्जी शिकायत बनवा और करवा रहे थे, जिसमे फिजिकल एजुकेशन के डॉ. योगेन्द्र सिंह तोमर जिन्होंने प्राचार्य कि जगह परीक्षा तीन दिन कराये जाने का प्रमाण पत्र दिया है जबकि वह डीग्री स्तर के विभाग के हैं व् डॉ.कमलेश दत्त पाण्डेय विभागाध्यक्ष महाविद्यालय के सबसे वरिष्ठतम प्राध्यापक और यहाँ तक कि प्राचार्य से भी वरिष्ठ, फिर इन्होने परीक्षा तीन दिन कराये जाने का प्रमाण पत्र क्यों नहीं दिया ? 

परन्तु  मैंने आप की गरिमा को मद्देनज़र रखते हुए उसी दिन यह संकल्प लेते हुए बाहर आया था की आपको सही तथ्यों से अवगत कराने की पूरी कोशिश करूंगा '' क्योंकि आपने इन भ्रष्ट और बेईमानी पर खड़े अपराधियों से मेरी रक्षा की थी, तब मैंने आप में मानव के रूप में 'भगवान' को देखा था और भक्तिभाव से अभिभूत था.

सर मैं हाई स्कूल में विज्ञानं का विद्यार्थी था. घर में साहित्यिक पत्र पत्रिकाएं आती थीं - धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान,दिनमान,सारिका और कादम्बिनी. कादम्बिनी में एक कबिता छपी थी "मिश्र शतक" शीर्षक से पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र की जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे उस पूरे शतक की सभी लाइनें बहुत अच्छी थीं पर ये दो लाइने-

कलाकार देता नहीं युगधारा का साथ,
बहती गंगा में नहीं धोता है वह हाथ.
मैं तब से उक्त दो पंक्तियों को मन में गांठ की तरह बांध कर रख लिया और आज तक विचलित नहीं होता हूँ .
आशा है जीवनभर निर्वहन कर सकूँगा. 
सर आप ने हिम्मत दी है अन्याय से लड़ने की मैं कोशिश करूँगा इस तरह की शैक्षणिक बेईमानियाँ और भ्रष्टाचार उजागर हों. 
पर जब व्यवस्था आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी हो .
सादर 
आपका 
रत्नाकर 

From-
Dr.Lal Ratnakar
Associate Professor & Head
Department of Drawing & Painting
M.M.H.College Ghaziabad-201001
Uttar Pradesh (INDIA) 
Mob;919810566808
----------------------
Res;
R-24,Raj Kunj, Raj Nagar
Ghaziabad-201002
0120 2828780

Sunday, December 22, 2024

संसद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने बी आर अंबेडकर की तस्वीरें थामीं।

 संसद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने बी आर अंबेडकर की तस्वीरें थामीं।

(फाइल फोटो | पीटीआई)
The New Indian Express
दिसंबर 21, 2024, 8:36 बजे
कांचा इलैया शेफर्ड

18 दिसंबर, 2024 को संसद में डॉ. बीआर अंबेडकर, ईश्वर और स्वर्ग पर अमित शाह का बयान न तो अचानक आया है और न ही जुबान फिसलने जैसा है।
 
वास्तव में, यह अंबेडकर को अध्यात्म से दूर करने और उन्हें भारत के राजनीतिक नेताओं की श्रेणी में रखने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लंबे समय से चली आ रही रणनीति का हिस्सा है - वह भी भारत के दलित नेताओं के साथ। आरएसएस अंबेडकर के लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव को मिटाना चाहता है, जब से उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया था। वे उन सभी सामाजिक ताकतों पर उनके भविष्य के प्रभाव को लेकर बहुत चिंतित हैं, जिन्होंने जाति उत्पीड़न और आर्थिक शोषण से मुक्तिदाता के रूप में अंबेडकर के प्रति श्रद्धा दिखाना शुरू कर दिया है।
 
अभी तक, अंबेडकर लाखों भारतीयों के लिए भगवान हैं। ओबीसी/दलित/आदिवासी आरक्षण की जड़ें गहरी होने के साथ ही अंबेडकर की छवि हर उस दलित/शूद्र/आदिवासी के घर में पहुंच रही है, जिसे आरक्षण के जरिए नौकरी मिली है। यहां तक ​​कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण भी उनकी विचारधारा की वजह से है, हालांकि आरएसएस/बीजेपी ने इसका इस्तेमाल ऊंची जातियों को संतुष्ट करने के लिए किया है। अंबेडकर की मूर्तियों की स्थापना में न केवल दलितों, बल्कि ओबीसी और आदिवासियों की भी बड़ी भागीदारी ने आरएसएस/बीजेपी को हिलाकर रख दिया है और उन्हें अंबेडकर की सामाजिक-आध्यात्मिक छवि को खराब करने के लिए कई रणनीतियां बनानी पड़ रही हैं। प्रकाश अंबेडकर और कुछ अन्य दलित बुद्धिजीवी, अपने राजनीतिक कारणों से, अंबेडकर को लुभाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी को एक समान करने की कोशिश कर रहे होंगे। लेकिन यह वास्तव में हिंदू राष्ट्र की तरह का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है, जिसके लिए अंबेडकर एक बड़ा खतरा बन गए हैं। यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि कांग्रेस कभी भी इस विचारधारा का हिस्सा नहीं थी। साथ ही, दो महत्वपूर्ण चरणों के दौरान, कांग्रेस ने अंबेडकर को खेल बदलने वाली भूमिकाएं निभाने की अनुमति दी। उनमें से एक संविधान लेखन में थी। इसके विपरीत, आरएसएस/भाजपा नेतृत्व अंबेडकर के संविधान को स्वीकार नहीं कर पाया, हालांकि वे 1999 तक अपने राजनीतिक विंग जनसंघ/भाजपा के माध्यम से चुनावों में भाग ले रहे थे, जब उन्होंने पहली बार दिल्ली से भारत पर शासन करना शुरू किया।
 
बाद के वर्षों में, अरुण शौरी जैसे उनके बुद्धिजीवियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अंबेडकर एक झूठे भगवान थे जिन्होंने कभी संविधान नहीं लिखा। दूसरी ओर, कांग्रेस ने संविधान के निर्माण में उनकी वास्तुशिल्प भूमिका को कभी सार्वजनिक रूप से नकारा नहीं।
 
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उसी नेहरू सरकार ने, जिसने उन्हें संविधान का मसौदा तैयार करने वाली टीम का नेतृत्व करने के लिए नामित किया था, 1956 में सनातन धर्म के खिलाफ आठ मजबूत प्रतिज्ञाओं के साथ लाखों लोगों को संगठित करके उन्हें बौद्ध धर्म अपनाने की अनुमति दी थी। यदि उस समय आरएसएस/भाजपा सत्ता में होती, तो वे अंबेडकर को इनमें से कुछ भी करने की अनुमति नहीं देते।
 
अब राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अंबेडकर के संविधान बनाम मनु धर्म शास्त्र, जाति जनगणना और आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को हटाने पर एक मजबूत रुख अपनाया है।
 
यही वह स्थिति है जिसने आरएसएस और भाजपा के बीच मुख्य वार्ताकार अमित शाह को अंबेडकर के खिलाफ बयान देने के लिए मजबूर किया।
 
नीले परिधान में अंबेडकर की तस्वीर थामे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने संविधान के जनक के साथ अपने संबंधों को बदल दिया - वर्तमान मुक्तिदायी लोकतांत्रिक संविधान के लिए खतरे के संदर्भ में, जिसने सार्वभौमिक समतावादी मूल्यों को स्थापित किया।
 
राज्यसभा में अमित शाह के बयान के निहितार्थ को समझते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "हम अंबेडकर के बिना यहां (सत्ता में) नहीं होते।" अमित शाह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। लेकिन फिर उनके शब्दों में तोड़-मरोड़ करने वाली क्या बात है?
 
दलित/आदिवासी और बड़ी संख्या में ओबीसी अंबेडकर को अपना भगवान मानते हैं। अमित शाह ने अंबेडकर और भगवान को अलग-अलग किया, बिना यह बताए कि वे किस भगवान की बात कर रहे थे।
 
आंबेडकर, भगवान और स्वर्ग के उनके आध्यात्मिक संदर्भ को देश भर में इस्तेमाल किए जा रहे दो नारों - जय भीम, जय श्रीराम के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। ये दो नारे पृथ्वी और स्वर्ग में समानता के भगवान और असमानता के भगवान के बारे में दो अलग-अलग विश्व दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत के सामाजिक स्तर पर एक स्पष्ट संघर्ष फैल रहा है। देशभर में अंबेडकरवादी जय भीम का नारा लगा रहे हैं और आरएसएस/बीजेपी की ताकतें जय श्रीराम का नारा लगा रही हैं।
 
भारत के शूद्र/दलित/आदिवासी लोग वर्तमान संविधान के अस्तित्व में आने से पहले स्वर्ग की राजनीति को नहीं समझते थे। लेकिन अब वे समझ गए हैं। अमित शाह मनु धर्म के स्वर्ग का उल्लेख यम धर्म नामक एक शक्ति के साथ कर रहे हैं, ताकि स्वर्ग में भी जाति-आधारित असमानता को बनाए रखने के लिए उस धर्म को लागू किया जा सके। अंबेडकर ने उस स्वर्ग को जला दिया और सभी मनुष्यों की समानता का एक नया स्वर्ग बनाया, जहां जाति का विनाश हो गया।
 
आरएसएस और भाजपा तथा अन्य शाखाओं में कार्यरत इसके वैचारिक नेतृत्व की दो रणनीतियां हैं - एक सनातन धर्म को पूरी तरह अक्षुण्ण रखना और दूसरी दलित/ओबीसी/आदिवासी ताकतों से वोट बटोरना, जो उस सनातन धर्म के शिकार हैं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में सनातन धर्म वर्ण धर्म के अलावा कुछ नहीं था। उन्हें दिल्ली और राज्यों में सत्ता में आने के लिए वोट चाहिए और साथ ही अंबेडकरवाद पर अंकुश भी चाहिए। हालांकि, उत्पीड़ित जातियों के बीच शिक्षित ताकतें अब आरएसएस की इस दोहरी रणनीति को कुछ हद तक समझती हैं। संसद में संविधान पर बहस ने अब संस्कृतियों के टकराव को खुलकर सामने ला दिया है। इससे पहले कोई भी कांग्रेस नेता अंबेडकर के वर्तमान संविधान, जो जाति और लिंग के बावजूद सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और मनु के संविधान, जिसे आरएसएस और हिंदू महासभा के गोलवलकर और सावरकर जैसे नेता अंग्रेजों के जाने के बाद, कम से कम कुछ हिस्सों में, अपनाने के योग्य मानते थे, को दोनों हाथों से दिखा नहीं सका ताकि देश को बताया जा सके कि आरएसएस/भाजपा वास्तव में मनु के संविधान को वापस लाना चाहते हैं। राहुल गांधी ने ऐसा किया। इसलिए अमित शाह का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने सदन को बताया कि अंबेडकर भगवान नहीं हैं और उनका संविधान ईश्वरीय कानून नहीं है। यह इस विश्वास से उपजा है कि मनु धर्म ईश्वरीय कानून है, हालांकि उन्होंने यह बात खुलकर नहीं कही। इसके बाद पहली बार संसद के लॉन में हिंसक झड़प हुई। मनु धर्म शास्त्र और वर्तमान संविधान को सदन में ले जाने और देश को यह बताने के लिए कि मानव समानता, लैंगिक न्याय और इसी भारत भूमि पर सभी के लिए समानता का स्वर्ग बनाने के आदर्शों में वे कैसे भिन्न हैं, राहुल गांधी के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन में शुरू हुई यह लड़ाई देश को कहां ले जाती है।

(कांचा इलैया शेफर्ड एक राजनीतिक सिद्धांतकार, सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक द शूद्र रिबेलियन है)।

Friday, December 20, 2024

बहुजन और वर्तमान राजनीति

बहुजन और वर्तमान राजनीति 
-डॉ लाल रत्नाकर 
हजारों साल से सामाजिक संघर्ष चला आ रहा है ।
यह कोई नई लड़ाई नहीं है और ना ही कोई नई जरूरत । जब देश के शासको के पास मनुस्मृति का विकल्प रहा होगा तब उसे व्यवस्था के अनुरूप समाज की संरचना बनी होगी केवल ऐसा नहीं है समाज के विभिन्न स्वरूप अलग-अलग समय में रहे हैं जहां अलग-अलग व्यवस्था भी थी। लेकिन आजादी के बाद हमारे मनीषियों ने यह विचार किया कि देश को कैसे चलाया जाए तो उसके लिए जरूरत थी एक लोकतांत्रिक संविधान की जो बाबा साहब अंबेडकर के नेतृत्व में तैयार हुआ।
 परंतु यहीं पर एक ऐसा समाज भी था जो इस संविधान के खिलाफ था और वह चाहता था कि मनुस्मृति का साम्राज्य चलता रहे । तो वह संविधान के प्रति कितना ईमानदार होगा। यहीं से शुरू होती है सामाजिक न्याय और बहुजन हित की लड़ाई। यह कहते हुए बिल्कुल नजरिया साफ रखना चाहिए की मनुस्मृति एक ऐसी समाज का निर्माण करती है जो समाज किसी भी दृष्टि से मनुष्य कहलन के योग्य नहीं समझा जा सकता। तभी तो बाबा साहब अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया होगा। घृणा का जितना बड़ा भंडार मनुस्मृति है वह रूह कपा देने वाली प्रक्रिया है। जहां मनुष्य मनुष्य के बीच में पशुवत व्यवहार किया जाता रहा हो।इन्हीं दुर्दादांत कार्यों के खिलाफ बाबा साहब अंबेडकर के नेतृत्व में जो संविधान बना उसे करने के लिए आज तक देश का एक ऐसा हिस्सा जो तैयार नहीं है और वह सारे लोग आज सत्ता में आ गए हैं और धीरे-धीरे संविधान की एक-एक धारा को परिवर्तित करते जा रहे हैं।
वह अपनी बोली और क्रिया से ईमानदार हो सकते हैं  ऐसा आज तक देखने को नहीं मिला। झूठ के बहाने इस देश की भोली भाली जनता को धर्म के नाम पर भीख के नाम पर लोभ और लालच का बहाना देकर ठग लिया है और वह नहीं चाहते की लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रहे।
भारतीय संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान की रचना के लिए किया गया था। ब्रिटेन से स्वतन्त्र होने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने। सन् 1925 ई॰ में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में कामनवेल्थ ऑफ इण्डिया बिल प्रस्तुत किया। जो भारत के लिए संवैधानिक प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करने का प्रथम प्रयास था। पहली बार संविधान सभा की माँग सन् 1895 ई॰ में बाल गंगाधर तिलक ने उठाई थी। अन्तिम बार (पाँचवी बार) 1938 में नेहरू जी ने संविधान सभा बनाने का निर्णय लिया था।

संविधान सभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित हुए थे। जिनका चुनाव जुलाई 1946 में सम्पन्न हुआ था।

भारत के विभाजन के बाद कुल सदस्यों (389) में से भारत में 299 ही रह गए। जिनमे 229 चुने हुए थे। वहीं 70 मनोनीत थे। जिनमें कुल महिला सदस्यों की संख्या 15 , अनुसूचित जाति के 26, अनुसूचित जनजाति के 33 सदस्य थे। बंटवारे के बाद 3 महिलाएं पाकिस्तान में चली गई और भारत के संविधान सभा में 12 महिलाएं रह गई जिनमे सरोजनी नायडू, एक मात्र हिंदू महिला दक्षिणायन वेलायुध्दन रह गई।[उद्धरण चाहिए]

परिचय
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई 1945 में ब्रिटेन में एक सरकार बनी। इस नयी सरकार ने भारत सम्बन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा एक संविधान निर्माण करने वाली समिति बनाने का निर्णय लिया। भारत की स्वतंत्रता/स्वतन्त्रता के प्रश्न का हल निकालने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने कैबिनेट के तीन मंत्री लॉरेन्स, क्रिप्स, अलेक्जेंडर को भारत भेजा। मंत्रियों के इस दल को कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है। 15 अगस्त 1947 को भारत के आज़ाद हो जाने के बाद यह संविधान सभा पूर्णतः प्रभुतासंपन्न हो गई। इस सभा ने अपना कार्य 1 दिसम्बर 1946 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। राजेन्द्र प्रसाद, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। अनुसूचित वर्गों से 30 से ज्यादा सदस्य इस सभा में शामिल थे। सच्चिदानन्द सिन्हा इस सभा के प्रथम सभापति थे। किन्तु बाद में राजेन्द्र प्रसाद को सभापति निर्वाचित किया गया। भीमराव अंबेडकर को निर्मात्री समिति का अध्यक्ष चुना गया था। संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में कुल 165 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी।

भारतीय संविधान सभा के सदस्य
मद्रास
ओ.वी.मुदलियार अलगेसन, अम्मु स्वामीनाथन, एम ए अयंगार, मोटूरि सत्यनारायण, दाक्षायणी वेलायुधन, दुर्गाबाई देशमुख, एन. गोपालस्वामी अयंगर, डी गोविंदा दास, जेरोम डिसूजा, पी. कक्कन, टी एम कलियन्नन गाउंडर, के. कामराज, वी. सी. केशव राव, टी. टी. कृष्णमाचारी, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, एल कृष्णास्वामी भारती, पी. कुन्हिरामन, मोसलिकान्ति तिरुमाला राव, वी. मैं मुनिस्वामी पिल्लै, राजा एम अन्नामलाई मुत्तैया चेट्टियार, वी. नादिमुत्तु पिल्लै, एस नागप्पा, पी. एल नरसिम्हा राजू, पट्टाभि सीतारमैया, सी. पेरुमलस्वामी रेड्डी, टंगुटूरी प्रकाशम, एस एच. गप्पी, श्वेताचलपति रामकृष्ण रंगा रोवा, आर लालकृष्ण शन्मुखम चेट्टि, टी. ए रामलिंगम चेट्टियार, रामनाथ गोयनका, ओ पी. रामास्वामी रेड्डियार, एन जी रंगा, नीलम संजीव रेड्डी, शेख गालिब साहिब, लालकृष्ण संथानम, बी शिव राव, कल्लूर सुब्बा राव, यू श्रीनिवास मल्लय्या, पी. सुब्बारायन, चिदम्बरम् सुब्रह्मण्यम्, वी सुब्रमण्यम, एम. सी. वीरवाहु, पी. एम. वेलायुधपाणि, ए क मेनन, टी. जे एम विल्सन, मोहम्मद इस्माइल साहिब, के. टी. एम. अहमद इब्राहिम, महबूब अली बेग साहिब बहादुर, बी पोकर साहिब बहादुर, वी. रमैया, रामकृष्ण रंगा राव

महाराष्ट्र
बालचंद्र महेश्वर गुप्ते, हंसा मेहता, हरिविनायक पटस्कर, भीमराव अम्बेडकर, यूसुफ एल्बन डिसूजा, कन्हैयालाल नानाभाई देसाई, केशवराव जेधे, खंडूभाई कसनजी देसाई, बाळासाहेब गंगाधर खेर, मीनू मसानी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, नरहर विष्णु गाडगील, एस निजलिंगप्पा, एस. के. पाटिल, रामचंद्र मनोहर नलावडे़, आर आर दिवाकर, शंकरराव देव, गणेश वासुदेव मावलंकर, विनायकराव बालशंकर वैद्य, बी एन मुनवली, गोकुलभाई भट्ट, जीवराज नारायण मेहता, गोपालदास अंबैदास देसाई, प्राणलाल ठाकुरलाल मुंशी, बी एच. खरडेकर, रत्नाप्पा कुंभार, वल्लभ भाई पटेल, अब्दुल कादर मोहम्मद शेख, आफताब अहमद खान विनायक राणे , पंजाबराव देशमुख, सं.दि.परब

पश्चिम बंगाल
मनमोहन दास, अरुण चन्द्र गुहा, लक्ष्मी कांता मैत्रा, मिहिर लाल चट्टोपाध्याय, काफ़ी चन्द्र सामंत, सुरेश चंद्र मजूमदार, उपेंद्रनाथ बर्मन, प्रभुदयाल हिमतसिंगका, बसंत कुमार दास, रेणुका राय, हरेन्द्र कुमार मुखर्जी, सुरेंद्र मोहन घोष, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, अरी बहादुर गुरुंग, आर ई. पटेल, क्षितिज चंद्र नियोगी, रघीब अहसान, सोमनाथ लाहिड़ी, जासिमुद्दीन अहमद, नज़ीरुद्दीन अहमद, अब्दुल हलीम गज़नवी, भीमराव अम्बेडकर

संयुक्त प्रांत
अजीत प्रसाद जैन, अलगू राय शास्त्री, बालकृष्ण शर्मा, बंशीधर मिश्र, भगवान दीन, दामोदर स्वरूप सेठ, दयाल दास भगत, धरम प्रकाश, ए धरम दास, रघुनाथ विनायक धुलेकर, फिरोज गांधी, गोपाल नारायण, कृष्ण चंद्र शर्मा, गोविंद बल्लभ पंत, गोविंद मालवीय, हरियाणा गोविंद पंत, हरिहर नाथ शास्त्री, हृदय नाथ कुन्ज़रू, जसपत राय कपूर, जगन्नाथ बख्श सिंह, जवाहरलाल नेहरू, विजय लक्ष्मी पंडित, जोगेन्द्र सिंह, जुगल किशोर, ज्वाला प्रसाद श्रीवास्तव, बी वी. केसकर, कमला चौधरी, कमलापति त्रिपाठी , आचार्य कृपलानी, महावीर त्यागी, खुरशेद लाल, मसुरियादीन, मोहनलाल सक्सेना, पदमपत सिंघानिया, फूल सिंह, परागी लाल, पूर्णिमा बनर्जी, पुरुषोत्तम दास टंडन, हीरा वल्लभ त्रिपाठी, राम चंद्र गुप्ता, शिब्बन लाल सक्सेना, सतीश चंद्रा, जॉन मथाई, सुचेता कृपलानी, सुंदर लाल, वेंकटेश नारायण तिवारी, मोहनलाल गौतम, विश्वम्भर दयालु त्रिपाठी, विष्णु शरण दुबलिश, बेगम ऐज़ाज़ रसूल, चौधरी हैदर हुसैन, हसरत मोहानी, अबुल कलाम आजाद, नवाब मुहम्मद इस्माईल खान, रफी अहमद किदवई, मौलाना हिफ्ज़ुर्हमान स्योहारवी, बशीर हुसैन जैदी

पूर्वी पंजाब
रणबीर सिंह हुड्डा, बख्शी टेक चन्द, पंडित श्रीराम शर्मा, जयरामदास दौलताराम, ठाकुरदास भार्गव, बिक्रमलाल सोंधी, यशवंत राय, लाला अचिंत राम, नंद लाल, सरदार बलदेव सिंह, गुरमुख सिंह मुसाफिर, सरदार हुकम सिंह, सरदार भूपिंदर सिंह मान, सरदार रतन सिंह लौहगढ़, सरदार रणजीत सिंह

बिहार
अमिय कुमार घोष, अनुग्रह नारायण सिन्हा, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, भागवत प्रसाद, बोनिफास लकड़ा, ब्रजेश्वर प्रसाद, चंडिका राम, लालकृष्ण टी. शाह, देवेंद्र नाथ सामंत, डुबकी नारायण सिन्हा, गुप्तनाथ सिंह, यदुबंश सहाय, जगत नारायण लाल, जगजीवन राम, जयपाल सिंह मुंडा, कामेश्वर सिंह, कमलेश्वरी प्रसाद यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, कृष्ण वल्लभ सहाय, रघुनंदन प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, रामेश्वर प्रसाद सिन्हा, राम नारायण सिंह, सच्चिदानन्द सिन्हा, सारंगधर सिन्हा, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, बिनोदानंद झा, पी. लालकृष्ण सेन, श्रीकृष्ण सिंह, श्री नारायण महता, श्यामनन्दन सहाय, हुसैन इमाम, सैयद जाफर इमाम, एस.एम.लतीफुर्रहमान, एम. ताहिर, तजमुल हुसैन, चौधरी आबिद हुसैन, हरगोविन्द मिश्र

मध्य प्रान्त और बरार
गुरु अगमदास, रघु वीर, बड़ेभाई ठाकुर ललोनी, राजकुमारी अमृत कौर, नगला भौगरा (कामा) , भगवंतराव मंडलोई, बृजलाल बियाणी, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, प. किशोरी मोहन त्रिपाठी, सेठ गोविंद दास, डाँ.सर हरिसिंह गौर, हरि विष्णु कामथ, हेमचन्द्र जगोबाजी खांडेकर, घनश्याम सिंह गुप्ता, लक्ष्मण श्रवण भाटकर, पंजाबराव शामराव देशमुख, रविशंकर शुक्ल, आर लालकृष्ण सिधवा, शंकर त्र्यंबक धर्माधिकारी, फ्रैंक एंथोनी, काजी सैयद करीमुद्दीन, गणपतराव दानी, आर.एल. मालवीय, रामप्रसाद पोटाई

असम
निबारन चंद्र लास्कर, जेम्स जॉय मोहन निकोल्स रॉय, धरणीधर बसु मतरी, गोपीनाथ बोरदोलोई, कुलाधौर चालिहा, रोहिणी कुमार चौधरी, मुहम्मद सादुल्ला, अब्दुल रऊफ

उड़ीसा
विश्वनाथ दास, कृष्ण चन्द्र गजपति नारायण देव, हरेकृष्ण महताब, लक्ष्मीनारायण साहू, लोकनाथ मिश्र, नंदकिशोर दास, राजकृष्ण बोस, शांतनु कुमार दास, लाल मोहन पति, एन माधव राव, राज कुंवर, शारंगधर दास, युधिष्ठिर मिश्र

दिल्ली
देशबंधु गुप्ता

अजमेर मेरवाड़ा
मुकुट बिहारी लाल भार्गव

कूर्ग
सी. एम. पूनाचा

मैसूर
(वर्तमान में कर्नाटक )

के.सी.रेड्डी, के.हनुमन्तैया, टी. सिद्धलिंगैया, आर गुरुव रेड्डी, एस वी कृष्णमूर्ति राव, एच. सिद्धवीरप्पा, टी. चेन्निया

जम्मू एवं कश्मीर
शेख मुहम्मद अब्दुल्ला, मोतीराम बैगरा, मिर्जा मोहम्मद अफजल बेग, मौलाना मुहम्मद सईद मसूदी

त्रावणकोर-कोचीन
(वर्तमान में केरल)

पट्टम ताणु पिल्लै, आर शंकर, पी. टी. चाको, पानमपिली गोविन्द मेनन, एनी मस्करीन, पी. एस. नटराज पिल्लई, के ए मोहम्मद

मध्य भारत
विनायक सीताराम सरवटे, बृजराज नारायण, गोपीकृष्ण विजयवर्गीय, राम सहाय, कुसुम कांत जैन, राधवल्लभ विजयवर्गीय, सीताराम एस जापू

सौराष्ट्र
बलवंतराय मेहता, जयसुख लाल हाथी, ठक्कर बापा, चिमनलाल चकूभाई शाह, सामलदास गांधी

राजस्थान
जयपुर से वी. टी. कृष्णमाचारी और हीरालाल शास्त्री, खेतड़ी से सरदार सिंह, बीकानेर से के एम पण्णिकर‌ और जसवंत सिंह, भरतपुर से राज बहादुर, उदयपुर से माणिक्य लाल वर्मा और बलवंत सिंह मेहता, शाहपुरा से गोकुल लाल असावा, अलवर से रामचंद्र उपाध्याय, कोटा से दलेल सिंह, जोधपुर से जय नारायण व्यास और सी एस वेंकटाचारी सर टी वी राघवाचर्या(उदयपुर)

विन्ध्य प्रदेश
अवधेश प्रताप सिंह, शम्भूनाथ शुक्ल, राम सहाय तिवारी, मन्नूलालजी द्विवेदी, भैयालाल सिंह

कूचबिहार
हिम्मत सिंह लालकृष्ण माहेश्वरी

त्रिपुरा और मणिपुर
गिरिजा शंकर गुहा, रवि मैहरा

भोपाल
लाल सिंह

कच्छ
भवनजी अर्जुन खिमजी

हिमाचल प्रदेश
यशवंत सिंह परमार

समितियाँ
संविधान सभा ने संविधान निर्माण के कार्य को त्वरित गति से पूरा करने के लिए 22 समितियों का निर्माण किया था। जिसमें आठ प्रमुख समितियाँ थीं।

प्रमुख समितियाँ

मसौदा समिति - बाबासाहेब आंबेडकर
केन्द्रीय ऊर्जा समिति - जवाहरलाल नेहरू
केन्द्रीय घटना समिति - जवाहरलाल नेहरू
प्रान्तीय घटना समिति - वल्लभभाई पटेल
मूलभूत अधिकार, अल्पसंख्यक, आदिवासी और अपवर्जित क्षेत्रों की सलाहकार समिति - वल्लभभाई पटेल
मूलभूत अधिकार उपसमिति - जे॰ बी॰ कृपलानी
अल्पसंख्याकांची उपसमिति - हरेन्द्र कुमार मुखर्जी
उत्तर-पूर्व सीमान्त आदिवासी क्षेत्र उप-समिति - गोपीनाथ बोरदोलोई
वगळलेले आणि अंशतः वगळलेले क्षेत्र (आसाम के अतिरिक्त) उपसमिति - ठक्कर बापा
प्रक्रिया समिति के नियम - राजेंद्र प्रसाद
राज्य समिति – जवाहरलाल नेहरू
सुकाणू समिति - राजेंद्र प्रसाद
राष्ट्रीय ध्वज तदर्थ समिति - राजेंद्र प्रसाद
संघटन कार्य समिति की बैठक - गणेश वासुदेव मावलणकर
सभा समिति - पट्टाभि सीतारमैया
भाषा समिति - मोटूरि सत्यनारायण
व्यवसाय समिति के आदेश - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी
राज्य समिति -गणेश वासुदेव मावलंकर
घटनाक्रम
6 दिसम्बर 1946: संविधान सभा की स्थापना हुई (फ्रेंच प्रथा के अनुसार)
9 दिसम्बर 1946: संविधान सभागृह (आज का संसद भवन सेंट्रल हॉल) में संविधान सभा की पहली बैठक हुई। संविधान सभा को संबोधित करने वाले प्रथम व्यक्ति जे.बी. कृपलानी थे। इसकी अध्यक्षता सच्चिदानन्द सिन्हा ने की। स्वतन्त्र देश की माँग करते हुए मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया।
11 दिसम्बर 1946: राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष, हरेंद्र कुमार मुखर्जी उपाध्यक्ष निर्वाचित।
13 दिसंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा उदेश्य प्रस्ताव पेश किया गया।
22 जनवरी 1947: वस्तुनिष्ठ ठराव सर्वानुमति से स्वीकार हुआ।
22 जुलाई 1947: संविधान सभा ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया।
15 अगस्त 1947: भारत को स्वतन्त्रता मिली। भारत से अलग होकर पाकिस्तान नामक देश बना।
29 अगस्त 1947: मसौदा समिति बनी, जिसके अध्यक्ष भींवराव आंबेडकर बनाए गए। इसके अन्य सदस्य ये थे: कन्हैयालाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाळ स्वामी अय्यंगार, एन. माधव राव, टी.टी. कृष्णामचारी ।
16 जुलाई 1948: हरेंद्र कुमार मुखर्जी वी.टी. कृष्णामचारी संविधान सभा के दूसरे उपाध्यक्ष निर्वाचित किये गये।
26 नवम्बर 1949: संविधान सभा ने भारतीय संविधान को स्वीकार किया और उसके कुछ धाराओं को लागू भी किया गया।
24 जनवरी 1950: संविधान सभा की बैठक हुई जिसमें संविधान पर सभी ने अपने हस्ताक्षर करके उसे मान्यता दी।
26 जनवरी 1950: सम्पूर्ण भारतीय संविधान लागू हुआ।
चित्रावली
अपमान करने वाले को देशद्रोही, संविधान विरोधी घोषित करो !

Thursday, March 7, 2024

2024 के लोकसभा चुनाव।

 2024 के लोकसभा चुनाव आनेवाले कुछ ही दिनों में घोषित होनेवाले हैं।

वर्तमान समय में देश की सत्ता जिन हाथों में है कहा जाता है कि वह अपने में ईमानदार नहीं हैं, लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि सारी लोकतंत्र की संस्थाओं को उसने अपनी सत्ता के लिए इस्तेमाल करते हुए उसके मूल कार्योंसे अलग कर अपने विरोधियों को फसाने का काम लिया जा रहा है इस सबकेबावजूद कोईभी बोलने वाला नहीं है जो भी बोलने की हिम्मत करता है उसको किसी ने किसी तरह से फंसा करके जेल में डाल दिया जा रहा है। परंतु इस बात की तरफ किसी भी संस्था में संविधान को भी ताकपर रखा जा रहा है। यह ऐसी विपरीत परिस्थिति है जब सबकी जुबान बंद कर दी गई है।

आईए आपको एक संसदीय चुनाव क्षेत्र के बारे में बताते हैं:

आईए जानते हैं जौनपुर की राजनीति के बारे में:

संसदीय राजनीतिक इतिहास में जो लोग जौनपुर को जानते हैं वह यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जौनपुर की राजनीति में ठाकुरों और ब्राह्मणों का बोलबाला रहा है, वह एक दौर था जब राजनीति में अन्य जातियों का उदय नहीं हुआ था।

राजा जौनपुर ठाकुर राम लखन सिंह श्री राजदेव सिंह उस दौर के ऐसे ही राजनीतिज्ञ थे। लेकिन इन्हीं सबके मध्य श्री लक्ष्मी शंकर यादव जी कांग्रेस की राजनीति में एक बड़े नाम थे विस्तार से न जाते हुए यह बताना यहां लाजमी है की जब से इस जनपद में यादव ने अपनी एक झुकता के साथ बहुजन समाज की जातियों को जोड़कर के राजनीतिक खेल में अपनी पारी शुरू की तब जौनपुर का संसदीय नजरा ही बदल गया। अर्जुन यादव से लेकर पारसनाथ यादव यहां के संसदीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी जीत दर्ज कराई जिसके पीछे यहां के बहुजन समाज के साथ-साथ तत्कालीन राजनीति का बहुजन दबाव बहुत महत्वपूर्ण है अब यह अलग बात है कि इस आंदोलन से इसके मुखिया यादव जाति के ऐसे लोग आगे आए जिन्होंने पूरी राजनीति में एक तरह की निराशा का समावेश किया क्योंकि वह राजनीतिज्ञ नहीं थे उनके पीछे जो राजनीतिज्ञ थे सबसे पहले उन्होंने उन्हें ही धोखा दिया परिणाम यह हुआ कि उन्हें विजय तो मिली लेकिन समय के साथ राजनीति में इतना उतार आया कि आज जौनपुर जनपद की राजनीति में जब यादव सांसद हैं लेकिन वह वर्तमान चुनाव की चर्चा से ही बाहर है।

इसके भी बहुत सारे कारण हैं क्योंकि वह सांसद तो बन गए परंतु राजनीतिज्ञ नहीं बन पाए राजनीतिज्ञ होने के लिए जरूरी नहीं है कि व्यक्ति बहुत पढ़ा लिखा हो बहुत बड़ा अधिकारी हो उसे राजनीतिज्ञ और सामाजिक होने की समझ होनी चाहिए।

श्री कृपा शंकर सिंह जी को भाजपा ने अपना प्रत्याशी किस लिए बनाया है इस पर भी गौर करने की जरूरत है ज्ञातव्य है की कृपा शंकर सिंह मूलतः जौनपुर के रहने वाले हैं लेकिन उनका पूरा राजनीतिक इतिहास देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से आरंभ होता है और वहीं से वह कांग्रेस के नेता के रूप में राज्य सरकार में गृह मंत्री जैसे पद पर विराजमान रहे और कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में बहुत सफल काम किया है। उनके कांग्रेस के गांधी परिवार से बहुत मधुर रिश्ते रहे हैं जिसकी जानकारी किसी से भी की जा सकती है। वर्तमान केंद्रीय सत्ता के ऑपरेशन कांग्रेस जिसको इस तरह से कहा जा सकता है कि कांग्रेस मुक्त भारत अभियान में यह भाजपा के अंग हो गए अब आप उनकी राजनीतिक हैसियत का आकलन इसी रूप में कर सकते हैं कि भाजपा में कितने कांग्रेसी किस-किस तरह से और किन कारणों से खपाए गए हैं।

अब आईए समाजवादी पार्टी की बात कर लेते हैं, 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बसपा ने लोकसभा के लिए गठबंधन किया था और बसपा ने उन तमाम सीटों को अपने खाते में लिया था जो जितने की सामर्थ्य रखती थी, यह किसी से छुपा नहीं है कि बहन जी अपने प्रत्याशियों से मोटी रकम वसूलती हैं। इसी तरह के प्रत्याशी को कहा जाता है कि मोटी धनराशि लेकर टिकट दिया गया था, स्वाभाविक था कि जौनपुर जनपद की यह सीट सपा और बसपा मतदाताओं से वोट की वजह से छिनी नहीं जा सकती थी, हालांकि उससे पहले जौनपुर का सांसद भाजपा का सांसद था और वही चुनाव भी लड़ रहा था लेकिन सपा बसपा गठबंधन ने उसको हताश और निराश कर दिया था जबकि जौनपुर जनपद की दूसरी सुरक्षित सीट सपा के लिए बहुत मजबूत सेट हुआ करती है वह भी भाजपा के खाते में थी लेकिन वहां बसपा का प्रत्याशी उस सीट के मत को संभाल नहीं पाया और चुनाव हार गया जबकि जौनपुर लोकसभा सीट सपा बसपा गठबंधन की बसपा प्रत्याशी के पक्ष में गई।

5 वर्षों के संसदीय काल में वर्तमान सांसद ने ऐसी कौन सी राजनीति की जिसकी वजह से आज वह पर्दे के पीछे से अपने लिए राजनीतिक घरानों का चक्कर काट रहे हैं कि उन्हें फिर से कौन चुनाव में उतार दे बसपा के सांसद होने के बावजूद भी वह बसपा से चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं इसका एक ही कारण है कि बसपा की जीत की कोई संभावना आज दिखाई नहीं देती। ऐसा कहा जाता है कि उनके ताल्लुक भाजपा में भी रहे हैं और उन्होंने वहां से भी 2024 की संसद के लिए प्रयास किया था लेकिन जौनपुर जनपद के लिए भाजपा की संसदीय सीट पर श्री कृपा शंकर जी के आने की वजह से वह संभावनाएं समाप्त हो गई हैं।

सपा बसपा अभी भी अपने कैंडिडेट के बारे में कोई घोषणा नहीं की है लेकिन इस समाचार पत्र नहीं धनंजय सिंह को सपा के प्रबल प्रत्याशी के रूप में बताने की जो कोशिश की है वह एक तरह से सपा को कमजोर करने की साजिश भी है इस पूरी खबर में सपा के अस्तित्व को ही नकारने की अपोजिट खबर बनाया गया है जो किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है और इस सब रणनीति का लब्बोलुआब यही बनता है कि क्या सपा भी बसपा के रास्ते पर चल पड़ी है जब बसपा अपने संसद के साथ खड़ी ना दिखाई देकर एक संदेश देती है कि सपा इतनी कमजोर क्यों दिखाई दे रही है जबकि उसके पास हर तरह के प्रत्याशी मौजूद हैं। उन प्रत्याशियों के चयन में सपा सपा कितनी बुद्धिमानी दिखाएंगे वह उसकी रणनीति का बहुत बड़ा हथियार साबित होगा।

सपा को राजनीति करनी है या अपने दायर को ऐसी दहलीज तक ले जाना है जहां से इंडिया गठबंधन की संभावनाएं समाप्त होती दिखाई देती हैं।

सपा के अगले कदम का इंतजार करना होगा।



Sunday, January 15, 2023

माटी के लाल की अंतिम विदाई में शिरकत करने की कुछ बातें:

 


https://www.youtube.com/watch?v=GZFkhdm2NcA

माटी के लाल की अंतिम विदाई में शिरकत करने की कुछ बातें:

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प्रात:काल भोपाल आकर,मा.शरद यादव जी के गांव आखरमऊं में अन्त्येष्टी के कार्यक्रम जाने हेतु सुनील सरदार जी के साथ जब हम दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे थे तब उनके कुछ संबंधी भी उसी जहाज से भोपाल जा रहे थे, स्वाभाविक था उन लोगों से यह समझना कि किस तरह का कार्यक्रम है। राजकमल राव जो उनके सन इन लॉ है से यह तय हो गया था कि बाहर मिलते हैं, इसी समय बातचीत में पता चला प्रोफ़ेसर सुशीला मोराले भी दूसरी फ्लाइट से भोपाल आ रही है हमारे उनके पहुंचने का अंतर बहुत कम था।

सुनील सरदार जी के और हमारे कई मित्र राष्ट्रीय पिछड़ा संगठन चलाते हैं जो कुशवाहा समाज से आते हैं जिनमें एडवोकेट धर्मेंद्र कुशवाहा, यशवीर कुशवाहा अपने खैरी साथी हो के साथ भी एयरपोर्ट पर उपस्थित हो गए थे।

राजकमल राव से मुलाकात हुई और उन्होंने जो कार्यक्रम बताया उसके अनुसार लगभग 12:00 बजे माननीय का पार्थिव शरीर बाई एयर भोपाल आना था स्वाभाविक है कि अब उसी कार्यक्रम से जुड़े स्टेट लॉउन्ज की तरफ हमे ले जाया गया।

मेरी फ्लाइट लगभग 7:30 बजे प्रातः काल भोपाल पहुंच गई थी और हम सब लोग 8:00 बजे तक इकट्ठे हो गए थे अब थोड़े बहुत विलंब से हम लोग उससे कह पहुंचे थे जहां पर प्रशासन तैयारी किए हुए थे माननीय के पार्थिव शरीर को ले आने के लिए

अब धीरे-धीरे बात लोगों तक पहुंच गई थी और भोपाल की जो भी उनके जमाने के नेता थे या उनके चाहने वाले थे इकट्ठे होने शुरू हो गए थे।

11:00 बजे के आसपास कांग्रेस के बड़े नेता और मध्य प्रदेश के अनेक बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह जी भी आ गए और जैसे ही 12:00 बजने को हुआ उससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वहां उपस्थित हो गए।

सभी के चेहरे नाम थे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे इतनी शांति पसरी हुई है और मीडिया के लोग उसी में अपने-अपने चैनल के लिए पल-पल की खबर दे रहे थे। कि फला फला आ गए हैं और पता चला है कि पार्थिव शरीर लगभग 12:00 बजे आने वाला है, यही हुआ उस स्टेट लाउंज में दरवाजे खुले और कंधे पर उनके पार्थिव शरीर को उठाए हुए शांतनु एवं परिवार के अन्य सदस्य दिखाई दिए साथ में सुभाषिनी उनकी मां के साथ जो महिलाएं इस अवसर पर रिसीव करने गई थी सब लोग आती हुई नजर आई।

मा. शरद जी के जिस पार्थिव शरीर को छतरपुर स्थित उनके आवास पर देखा था, जहां देश के राजनीतिक बहुत ही विनम्रता से उन्हें विदाई दे रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे वह विश्राम कर रहे हैं और अभी थोड़ी देर में उठ खड़े होंगे, यह उनके साहस के प्रति कम से कम मेरे मन में हमेशा विश्वास था, जितनी शालीनता से देश के बहुजन मानस की सेवा के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी लगा दी। आज सुबह कल की सुबह से अलग थी क्योंकि जैसे ही उनके ना रहने की खबर मुझे फोन द्वारा संजय भाई ने दी थी उसी समय प्रातः काल दिल्ली के लिए निकलने की फ्लाइट मुंबई से तय हो गई थी अजय भाई और उनके परिवार को जब हमने यह खबर बताएं तो सभी लोग आहत थे और मेरा तत्काल दिल्ली पहुंचना मेरे कर्तव्य साथ जुड़ा हुआ था।

लेकिन आज भोपाल के हवाई अड्डे पर लगने लगा था कि अब वह हमारे बीच से चले गए हैं।उन्हें एक सफेद बक्शे में पार्थिव शरीर के रूप में चार्टर्ड के द्वारा भोपाल लाया गया था और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी यह यात्रा मुझे पैतृक गांव के लिए एक काफिले की निकल ली थी प्रदेश के मुख्यमंत्री इस यात्रा की अगवानी किए थे और निवर्तमान मुख्यमंत्री इस यात्रा में उनके पैतृक गांव तक बिल्कुल सामान्य व्यक्ति की तरह मौजूद रहे।

जगह-जगह लोगों ने उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए इस पार्थिव शरीर के वाहन में चालक के बगल में बैठे उनके पुत्र शांतनु सबके अभिवादन स्वीकार करते हुए बढ़ रहे थे, सामाजिक न्याय के अग्रदूत मंडल मसीहा  आज अपनी उसी मातृभूमि को लौट रहे थे जहां से वह निकल कर जबलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा लेने के लिए एक युवा के रूप में आए थे।



तब से लेकर अब तक उस गांव जाने के रास्ते हाईवे से जुड़े हैं के आसपास उद्योग धंधे बड़े हैं बड़े हिस्से में पर्वतीय श्रृंखलाएं दिखाई देती है लेकिन उनके घर पहुंचने से पहले जो हरे भरे खेतों का बहुत बड़ा विस्तार दिखाई दिया वह बता रहा था जी यह कृषि योग्य उपजाऊ भूमि है।

गांव के रास्ते पर मुडने से पहले के एक पेट्रोल पंप पर स्थानीय प्रशासन के लोग पुलिस की खुली गाड़ी को बहुत सादगी से तैयार करके रखे थे और अब भोपाल से लाए वाहन से पार्थिव शरीर को निकालकर उस पुलिस की गाड़ी पर रखा गया जिस पर चढ़ने की मेरी हिम्मत नहीं हुई हालांकि इस गाड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी के साथ परिवार के लगभग सभी सदस्य उपस्थित थे मैं चाह कर भी नहीं जा सकता था मैं अक्सर उनके पास रहकर खड़ा ही रहता था, और जब से मै उनके साथ राजनीति में आया था मर्यादाओं का बहुत ध्यान रखता था।

मुझे लग रहा था जैसे वह कह रहे हैं तुम करीब क्यों नहीं आ रहे हो। मैं दूसरी तरफ चला जाता था की जिससे उन्हें यह ना दिखाई दे। लेकिन हमेशा उनके विचारों के साथ होता था, जब लोग के साथ अकेले होता था क्या क्या सिखाते थे कितनी पुरानी पुरानी बातें बताते थे मैंने देखा था कि राजनीति में जो इतने करीब दिखाने की कोशिश करता है उसका भाव क्या है वह बहुत अच्छी तरह समझते थे।

आज यह अवसर ऊन बातों को कहने का नहीं है आंख बार-बार भर आ रही थी, क्योंकि पिछले दिनों से सरकार की निरंकुशता जब उसने सात तुगलक रोड के आवास को एक ऐसे व्यक्ति से खाली करा लिया था जिस व्यक्ति का योगदान देश के संविधान को गौरवान्वित करने का रहा हो, उनका अपना कोई निजी आवास ना होने की वजह से उन्हें सुदूर छतरपुर के फार्म हाउस में किराए के घर में रहना पड़ा था। 

यह बात अब समझ में आई कि अपने परिजनों से उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के लिए अपने गांव को क्यों चुनने को कहा था.......?

अब जैसे ही सड़क से पार्थिव शरीर का वाहन गांव में मुड़ा था अगल बगल मेला लगा था, बड़े बुजुर्ग सभी दुखी थे, हालांकि रास्ते में जितनी बाजारें पड़ी थी उनमें ऐसा लग रहा था जैसे सब लोग सड़क पर आ गए हैं, जो सड़क पर नहीं आए हैं वह अपने छतों की मुरेडों से ऐसे नायक को देख रहे हो जो सत्य के मार्ग पर चलते हुए वहां वापस आ रहा हो जहां से वह देश की सेवा के लिए निकला था, अपने उसी भारत के गांव में जो आज के गांव जैसा और आज के नेताओं जैसा नहीं है जहां पर केवल अपनी सुविधाओं का अंबार लगा दिया जाता है।

एक और बात बताता चलूं कि उनके इंजीनियरिंग के साथी जैन साहब उनके गांव में पैदल चल रहे थे जो पूरे जैसे शहर में अपना उद्योग चलाते हैं एयरपोर्ट से ही मैं उनको देख रहा था उनकी सादगी उनका समर्पण और एक मित्र के प्रति समर्पित सम्मान।

और वहां के लोगों की छवि।

मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी तक अपनी उपस्थिति से कितने शांतप्रिय तरीके से माननीय शरद यादव जी के प्रति आदर और सम्मान दिया है, यह उनके महान व्यक्तित्व कसौटी रही है क्योंकि वह हमेशा बाबा साहब अंबेडकर पेरियार राम मनोहर लोहिया जगदेव प्रसाद कुशवाहा ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले बिरसा मुंडा और न जाने कितने ऐसे नायक जिन पर हमेशा पर चर्चा करनी थी उन्होंने अपने कर्तव्य के साथ उन्हीं लोगों के त्याग और जनकल्याण की विचारधारा को जीवन भर धारण करके रखा आज वही जनता विस्मयकारी दृष्टि से उस पूरे सफर को देख रही थी।

मैंने देखा कि वहां के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बैठ कर के सारी व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे और जो भी पुलिस व्यवस्था के लिए लगाई गई थी जैसे उसको पता हो कि वह क्या चाहते थे।

मैं जब गांव में पारंपरिक क्रियाकलाप चल रहे थे तो अड़ोस पड़ोस की उन घरों पर गया जो महिलाएं लगभग बुजुर्ग हो गई थी उनसे पूछा कि आप कुछ कहेंगी उनके बारे में। सुदूर जमीन पर बैठा एक व्यक्ति कह रहा था जब वह आते थे तो सबको पैसा मांगे थे किसी को नहीं छोड़ देते जो भी उनसे मिलता था।

अपने वैभवशाली केंद्र और प्रदेशों की सत्ता जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय था सुचिता थी जिसकी आवाज से भारत की संसद और संसदीय गरिमा में उनकी संवैधानिक ढांचे को ठीक करने के लिए दहाड़ को पूरा देश देखता और सुनता था,

मंडल कमीशन का मामला हो सामाजिक न्याय का मामला इसके अलावा उनके अनेक क्षेत्रों में किए गए सुधारवादी कार्यक्रमों का सवाल हो। श्रोता यह महसूस करता था कि जैसे उसका अपना कोई प्रतिनिधि भारत के इस बड़े पंचायत घर में बहुत जोरदार तरीके से उसकी आवाज को बुलंद कर रहा है।

आज गांव पहुंचकर यह लगा कि वह किसके लिए बोलते थे उन बेईमानों के लिए जो उनके साथ लगे रहे और उनके विचारों से बहुत दूर रहें, कितने लोगों को जानता हूं मैं लेकिन वह गांव उनकी सच्चाई कर रहा था नॉर्मल है नमन कर रहा था वहां के पेड़ पौधे पशु पक्षी उस मिट्टी से निकले हुए व्यक्ति के अपने साथ समाहित होने के उत्सव में शरीक थे।

एक बात विचलित कर रही थी पूरे जीवन उन्होंने जिस पाखंड के खिलाफ खुल करके बोला, उन्हीं पाखंडीयों की परंपरा के नाम पर मैं भीतर से बहुत कमजोर महसूस कर रहा था एक ऐसे महापुरुष को उनके आसपास के लोग नहीं समझ पाए। हो ना हो कल वह जरूर समझें जो व्यक्ति अपनी इस मिट्टी से जुड़ा रहना चाहता था, उसके लोग उनसे क्यों नहीं जुड़ पाए।

सादर नमन।

अलविदा।


Friday, August 19, 2022

अभिव्यक्ति की आजादी



अभिव्यक्ति की आजादी
पर ताला लगा हुआ है।
अन्यथा मैं यह कहता
कि क्या जातिवाद ?
खत्म हो गया है।
अपनी ही जाति को
रेवड़ियां बटनी बंद हो गई हैं।
क्योंकि तुम्हारी जाति,
जातिवाद से बाहर है।
जातियों की संरचना करते वक्त
तुम्हें या तुमने अपने को !
सर्वोच्च बता दिया था।
और अपनी जाति के लिए,
गलती न करने का प्रमाण पत्र
दे दिया था।
और यही कारण है कि
जनता यह मान करके 
बैठ गई थी कि यह सर्वोच्च हैं
जातियों में जो गलती नहीं करते।
सारे समाज का प्रसाद ले लेते हैं
और जूठन भी औरों को,
बहुत अपमानजनक तरीके से,
घृणित और अपमानित करके
पत्तलों को उठवा करके,
उस पर बचे हुए अन्न को,
पशु और जानवरों से बचने पर
उन्हें प्रसाद के रूप में देते हैं।
कुत्ते आदि के जूठन को।
जूठन नहीं मानते।
धूल पोंछकर पवित्र कर लेते हैं।
लेकिन अपने द्वारा बनाई हुई
जातियों को छूना भी 
वर्जित कर रखा है।
पवित्रता का पैमाना मानते हैं।
गैर बराबरी और ऊंच नीच
का बाजार हजारों साल से
सजा हुआ है मनुष्य के रूप में
हजारों जातियां स्वउपयोग के लिए,
बहुत चालाकी से गढ़ा हुआ है।
अभिव्यक्ति की आजादी
पर ताला लगा हुआ है।
अन्यथा मैं यह कहता
कि क्या जातिवाद ?
खत्म हो गया है।

- डॉ. लाल रत्नाकर

वैश्य वर्ण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है,

 वैश्य वर्ण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका इतिहास वेदिक काल से लेकर आधुनिक समय तक फैला हुआ है। ...