Friday, August 19, 2022

अभिव्यक्ति की आजादी



अभिव्यक्ति की आजादी
पर ताला लगा हुआ है।
अन्यथा मैं यह कहता
कि क्या जातिवाद ?
खत्म हो गया है।
अपनी ही जाति को
रेवड़ियां बटनी बंद हो गई हैं।
क्योंकि तुम्हारी जाति,
जातिवाद से बाहर है।
जातियों की संरचना करते वक्त
तुम्हें या तुमने अपने को !
सर्वोच्च बता दिया था।
और अपनी जाति के लिए,
गलती न करने का प्रमाण पत्र
दे दिया था।
और यही कारण है कि
जनता यह मान करके 
बैठ गई थी कि यह सर्वोच्च हैं
जातियों में जो गलती नहीं करते।
सारे समाज का प्रसाद ले लेते हैं
और जूठन भी औरों को,
बहुत अपमानजनक तरीके से,
घृणित और अपमानित करके
पत्तलों को उठवा करके,
उस पर बचे हुए अन्न को,
पशु और जानवरों से बचने पर
उन्हें प्रसाद के रूप में देते हैं।
कुत्ते आदि के जूठन को।
जूठन नहीं मानते।
धूल पोंछकर पवित्र कर लेते हैं।
लेकिन अपने द्वारा बनाई हुई
जातियों को छूना भी 
वर्जित कर रखा है।
पवित्रता का पैमाना मानते हैं।
गैर बराबरी और ऊंच नीच
का बाजार हजारों साल से
सजा हुआ है मनुष्य के रूप में
हजारों जातियां स्वउपयोग के लिए,
बहुत चालाकी से गढ़ा हुआ है।
अभिव्यक्ति की आजादी
पर ताला लगा हुआ है।
अन्यथा मैं यह कहता
कि क्या जातिवाद ?
खत्म हो गया है।

- डॉ. लाल रत्नाकर

जीवन बहुत महत्वपूर्ण पल है


जीवन बहुत महत्वपूर्ण पल है
एक एक पल का मूल्य अमूल्य है
रचना धर्मिता हर पल का
बहुमूल्य तोहफा है।
क्योंकि प्रकृति ने हमें,
आपको और उन सबको इसे
बांटने के लिए सौंपा है।
हम आप और वो लोग जो
प्रकृति की अमूल्य धरोहर को
बांट सकते हैं हमें अधिकार,
अवसर प्रदान कर सकते हैं।
नफरत करने वालों के लिए
यह महत्वपूर्ण संदेश है,
जो वक्त बर्बाद कर रहे हैं
अपना भी और प्रकृति का भी
प्रकृति पल-पल बदलती है रूप
कभी छांव कभी धूप।
हम दौड़ते जाते हैं भागते जाते हैं
प्रकृति के विशाल आंगन में
प्रकृति हमें देती है जीवन।
हम बना सकते हैं उसे संजीवनी, 
और बिखेर सकते हैं यही जीवन
हजारों हजार युवा प्राणियों में।
यदि हमारे मन में नफरत नहीं है।
नफरत करने वालों।
जरा खुद से नफरत करके देखो।

- डॉ लाल रत्नाकर

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