अवाम की आज़ादी है या उसकी बर्वादी !
यह कौन बताएगा या कौन सुनाएगा हमें !
जब से आप हमें भूल गए हो और दूर गए हो !
हमारी जमात को मज़हब से जोड़ रहे हो !
हम तो फिर आ करते थे हर दरवाजे पर।
हर दरवाजे के कपाट अब हमारे लिए बंद है।
कहीं गाय का तो कहीं लंपटो का जमावड़ा है।
भगवा पहन के चोर उचक्कों का सामना हमसे।
हमें तो वैसे ही लोगों से शिकवा गिला रहता था।
कि हम मौका पाकर बच्चों को चुराया करते हैं।
अब आपकी सरकार का गजब का नुमाया है.

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